Friday, February 27, 2026

Acrostic for an ascetic

Suffering is the only all-pervasive reality
Come now, let Buddha give you some clarity
How can we go past the transcendental fence
Of course we see everything through Kantian lens
Picture a Will, striving, relentless, always hungry
Every night before I sleep it speaks to me
No one else made bodily feeling central 
How can we ignore what seems noumenal
Advait is the solace of my life and death
Unity of being, universe in a breath
Every piece of music is Will's incarnation 
Representing that without representation

Friday, June 05, 2020

कुत्ते की मौत

एक ज़माना था
जब सब भगवान से डरते थे
जब कुत्ते और इंसान
एक-सी मौत मरते थे

कभी भूख से
कभी उमरदराज़ी से
कभी प्रेमी की नज़रअंदाज़ी से
कभी इलाका बचाने की जंग से
कभी शरीर के बदलते रंग से 

मौत के पीछे तरक़्क़ी की दलील नहीं थी
मौत कैसी भी हो
कम से कम ज़लील नहीं थी

मगर आजकल सड़कें चिकनी
और गाड़ियां तेज़ हैं
भगवान भी बाकी चीज़ों की तरह
बस weekend वाला craze है

अब जब इंसानों की बनाई
और इंसानों की चलाई गाड़ियां
इंसानों को accidentally रौंदती हैं
तो कुत्तों के दिलो-दिमाग में 
एक बिजली-सी कौंधती है

सोचते हैं ये ससुरा इंसान
और कितनी तरक़्क़ी करेगा
बेटा संभल के सड़क पार करना
वरना तू भी इंसान की मौत मरेगा

Sunday, March 31, 2019

Acrostics for Acrophobics

Rambunctious ramblings resound
Ostracised for being pleasure-bound
Careful with that guitar, Eugene
Knowledge is not always the same as sound
'Neath the surface lies the dirt
Run into all sorts in this line of work
Ostentatious, outcast, or ordinary
Lazy, lewd, or just plain hurt
Let it play, I say

Thursday, March 21, 2019

बुरा ना मानो होली है

जला दो
आज सब जला दो
दुनियादारी का कचरा
जिसमें सड़ी-गली परम्पराओं के
कीड़े पलते हैं
जो इंसानियत के करिश्मे को
समाज की चटनी
और कर्तव्य का तड़का लगाके निगलते हैं
कभी हाथ जोड़ के
कभी फैला के
कभी हिम्मत तोड़ के
कभी हिमाकत दिखा के
कभी दण्डवत होके
कभी झुक के उठ के खाते धोखे
इस गंदगी में लोटने वाले
दुश्मन हैं अपने ही बच्चों के
कौन ज़्यादा गंदगी में पड़ा है
किसका ख़्याली पुलाव ज़्यादा सड़ा है
बस यही बहस बची है अब
ये भी कर लो
अपने-अपने पाक-पवित्र कूड़ेदान में
महफूज़ रहने का दम भर लो
मूर्ति उठा के नाच लो
या ताजिये चौराहे पे धर लो
ना ज़िन्दगी में कुछ किया है
ना करने की औकात है
तो क्या? करने को देशभक्ति की बात है
और झाड़ने को परम्परा है, मज़हब है, जात है
कभी धर्म खतरे में है
कभी धर्मनिरपेक्षता खतरे में है
काश कभी ये सोचा होता
कि तुम भी कचरे में हो
और वो भी कचरे में हैं
इस कचरे में इंक़लाब का घी डालो
सच्चाई की चिंगारी दिखाओ
और ज़मीर की हवा दो
आज सब जला दो

Tuesday, February 14, 2017

तुम्हें क्या मालूम

तुमसे कितना है हमें प्यार तुम्हें क्या मालूम
इस ज़िन्दगी के सरोकार तुम्हें क्या मालूम

दिल में जो भी है वो चिल्ला दो मगर धीमे से
खत भी हो जाते हैं अख़बार तुम्हें क्या मालूम

आज जो कल की कोई बात करी तो फिर से
आज हो कल का गुनहगार तुम्हें क्या मालूम

इक कहानी तुम्हारी आँखों में पढ़ लेता हूँ
जग से होता हूँ जब बेज़ार तुम्हें क्या मालूम

इक हंसी नर्म से होठों पे तैर जाए बस
पलट जाए मेरी सरकार तुम्हें क्या मालूम

तमन्नाओं की दुकानें तो बहुत हैं लेकिन
लम्हों का ना कोई बाज़ार तुम्हें क्या मालूम

तुमसे कितना है हमें प्यार तुम्हें क्या मालूम
इस ज़िन्दगी के सरोकार तुम्हें क्या मालूम

Saturday, June 25, 2016

थोड़ी और ग़ालिब-गलौज

बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मेरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे

I see the world as a kids' playground
I watch this daily spectacle of light and sound

एक खेल है औरंग-ए-सुलेमां मेरे नज़दीक
एक बात है ऐजाज़-ए-मसीहा मेरे आगे

A game of thrones plays out near me
Before me, messianic prophecies abound

होता है निहां गर्द में सहरा मेरे होते
घिसता है जबीं ख़ाक़ पे दरिया मेरे आगे

Even as I watch, deserts turn to dust
And rivers grinds their heads on the ground

मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तेरे पीछे
तू देख कि क्या रंग है तेरा मेरे आगे

Don't ask me how I'm doing without you
Just notice how you blush when I'm around

ईमां मुझे रोके है तो खींचे है मुझे क़ुफ़्र
काबा मेरे पीछे है कलीसा मेरे आगे

Morals hold me back as blasphemy pulls me in
I left the mosque behind but hear the church bell's sound

आशिक़ हूं पे माशूक़_फ़रेबी है मेरा काम
मजनूं को बुरा कहती है लैला मेरे आगे

I'm a romantic who betrays all romantic souls
Juliet bitches about Romeo when I'm around

गो हाथ को जुम्बिश नहीं आंखों में तो दम है
रहने दो अभी साग़र-ओ-मीना मेरे आगे

My hands may be devoid of strength but sight is still perfect
Let me see this sea of liquor, even if I can't get drowned

Saturday, May 28, 2016

शराब-ओ-ख़राब/Liquor and other vices

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें 
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें
If I lose you, I may still find you in my dreams
Like finding old flowers long buried in book seams

ढूँढ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती 
ये ख़ज़ाने तुझे मुम्किन है ख़राबों में मिलें 
Try digging broken hearts to look for gems of faith
Treasures like these may be hidden in painful screams 

ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो
नश्शा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें 
Combine the wordly sorrows with those of the heart
Oh what a high when liquor streams meet liquor streams!

Friday, November 20, 2015

मज़हबी

अगर तुम हिन्दू होतीं
रोज़ नए रूप में रूबरू होतीं
हर दिन मेरी किसी नयी बात पर निसार होतीं
मेरे बारे में रोज़ नयी कहानियां गढ़तीं
और रोज़ मेरी पुरानी कहानियों से लड़तीं
मुझसे जी भर के मिलतीं
पर मुझको रत्ती भर भी ना मिलतीं
कहीं ना होकर भी हर सू होतीं
अगर तुम हिन्दू होतीं

अगर तुम मुसलमाँ होतीं
कभी पूरा ना होने वाला अरमां होतीं
हर रोज़ पहली सी मोहब्बत करतीं
खुद से ज़्यादा मुझपे यकीन करतीं
मेरी गलतियों को छुपा लेतीं
मेरे एक वादे पर ज़िन्दगी बिता लेतीं
मेरी किसी बात को ना टाल पातीं
मुझको मुसीबत में संभाल पातीं
मेरी हर परेशानी से परेशां होतीं
अगर तुम मुसलमाँ होतीं

अगर तुम क्रिस्चियन होतीं
कभी बुढ़ापा कभी बांकपन होतीं
हफ्ते भर की दुनियादारी के बाद
मुझे sunday के सुकूं की तरह मिलतीं
जब मिलतीं तो गुनहगार सी
जब बिछड़तीं तो तलबगार सी
बेज़ुबां बच्चे की ज़ुबान जैसी
बेमतलब बेपरवाह बे-सुख़न होतीं
अगर तुम क्रिस्चियन होतीं

अगर तुम बौद्ध होतीं
गीली मिट्टी सी तुम्हारी सौंध होती
अपने जज़्बातों से ही घबराई सी
छुपा लेतीं खुद को मुझे भुलाने के लिए
घूमतीं गली गली सबको समझाने के लिए
कि मोहब्बत में दर्द मिलता है
सुकूं बस फ़र्द-फ़र्द मिलता है
मैं अँधेरे में तुम्हारी आहटें तलाशता और
पूरी दुनिया तुमसे चकाचौंध होती
अगर तुम बौद्ध होती

अगर तुम सिख होतीं
लटके हुए चेहरों पर कालिख होतीं
कहानियों से खींचकर मुझको तुम
हक़ीक़त में धम से ला पटक देतीं
मेरी मोहब्बत सीधे बोतल से गटक लेतीं
हर पल में और वक़्त भर जातीं
कोई जी सके इसलिए मर जातीं
सेवा करतीं फिर भी मालिक होतीं
अगर तुम सिख होतीं

अच्छा हुआ कि तुम सिर्फ़ ये सब नहीं हो
मज़हबी हो लेकिन कोई मज़हब नहीं हो
कभी हिन्दू की ख़त्म ना होने वाली कहानी हो
कभी मुसलमाँ की अपनों के लिए क़ुरबानी हो
कभी क्रिस्चियन की जानी बूझी बेपरवाही हो
कभी सिखों के जीवन-जाम की सुराही हो
कभी वो बौद्ध जिसे किसी की तलब नहीं हो
आखिर बस इसां हो, गुटबाजी का सबब नहीं हो
अच्छा हुआ कि तुम सिर्फ़ ये सब नहीं हो

Saturday, November 15, 2014

The real Islamic State

Pakistan was one of the most dangerously stupid ideas in history. And it's illogical creation has everything to do with its current state. It was the first ever country created "for Muslims". Sure there had been theocracies all through Islamic and even Christian history. But these were states ruled by dynasties who pledged their allegiance to some religious authority. Their existence or boundaries were not defined by religion. Pakistan changed that. It was an idea of a nation that existed for Islam, not a nation ruled by a dynasty that adhered to Islam. Of course behind this high sounding ideal lay the same old battle for land and power - a battle that had taken the form of a civil war. Which is why at that moment there was no point trying to prevent its formation and causing more bloodshed. But ever since its creation, this fundamental mistake of making religion a unifying national identity has led to one catastrophic development after another. The most damning consequence has been a constant and disproportionate focus on India as the "other". This continuing insecurity stems from a need to define itself as a separate country that has historically been different from India. That of course is impossible to do, so the only recourse is to go back to that original mistake and make it even bigger by appealing to a more and more extremist version of Islam. Its creation as a separate country based on religion has allowed the most dangerous development of all: its armed forces have become a tool for promoting religious nuts. Once the idea of protecting the religion has been succesfully sold, it won't stop at simply creating a nation. The threat, being almost totally imaginary, can always be invoked to achieve any political aim. So the new threat are Ahmadiyyas and Shias, who are apparently not Muslim enough. Zia ul Haq was no religious man. He simply sought to strengthen his military with US help and offered his country as a training ground for mujahideen in return. But in the process he both militarised the community and communalised the military. He was able to do what he did only by appealing to the strange idea of Pakistan. It's no accident that the country keeps slipping into military dictatorship. Its very existence is defined by its insecurity. It's also no accident that rather than all the countries that have adhered to Islamic law for centuries, it's Pakistan that has become notorious for religious extremism. From the Arab countries to Central Asia, extremist groups everywhere send their boys to Pakistan to receive training. It is the only country created with the specific agenda of "protecting" Islam. This rationale justifies every political and military strategy aimed at manipulating the most gullible minds in the name of Islam.

Yes, all national boundaries are arbitrary to some extent. But when they evolve over time they gradually become natural. When they are created by a stroke of a pen based on some artificial logic, they become conflict zones. The breakup of Ottoman empire created many such conflict zones, most notably Israel. This is another country created on the same strange basis of protecting a religion. Imagine the weirdness of this logic: we can't protect you in our own homeland so we will settle you in someone else's.

I'll be the first to admit that even the idea of India has many such inherent contradictions. The most natural boundaries are, well, natural ones. As I said, geography is the most logical guide. Even culture and language is a by-product of geography. This is why no Indic empire ever included the Himalayan kingdoms. Uttarakhand and Himachal were parts of the Nepali nation till the Brits annexed them - literally for the purpose of 'chilling'. Similarly, the dense forests of Chhatisgarh had been left to their own devices by most rulers and never really formed a part of any empire, and even today it is harder to 'sell' nationalism in that region. No pan-Indian empire ever reached the deep south either, which is why that region too has a strong independent identity. So yes, India too is struggling with its own contradictions in trying to define the idea of nationhood. But whatever else the idea of India may or may not include, it had historically always included the area east of Indus, i.e. Punjab and Sindh.

Now I don't know how to correct this historical blunder. I hope the ordinary people of Pakistan find their voice and the authorities find a better reason for the country to exist. What I do know is that promoting the idea of a Hindu nation will be an equally massive blunder for us. In fact Hindu organizations did play a significant role in selling the idea of Pakistan. In this day and age, uniting people in the name of some religion that most of them don't even understand, is the worst possible way of channeling their energies. Let's not fall into that trap.

Friday, November 07, 2014

बाज़ारू

मियां अशरफ़ अली
ठिकाना गुमनाम गली
साल भर वजूद की तलाश में सर धुनता है
मगर नवरात्रों में
रावण का सर वही बुनता है
नौ दिन, नौ रात
भूले से ही कभी निवाला चखता है
बिना इरादा किये
पूरे नौ व्रत रखता है

रामदीन लहरी
ठिकाना पुरानी कचहरी
साल भर बिखरी हुई ज़िन्दगी के टुकड़े चुनता है
मगर उर्स में
गुलाब-मोगरे की सबसे बेमिसाल चादर
वही बुनता है
भूल जाता है अपना जन्मदिन
मगर पीर का याद रखता है
अनजाने, बिन माने
अपनी इबादत रोज़ परखता है

फ़ारुख़ अफ़रोज़ 'फ़र्रा'
ठिकाना अँधेरा कोना, सुनसान दर्रा
साल भर माँ-बाप और पुलिस की गालियाँ सुनता है
मगर मुहर्रम आते ही
अशूरा के जुलूस के लिए लौंडे वही चुनता है
ना इमाम हुसैन की शहादत
ना ज़िन्दगी के बारे में इल्म रखता है
मगर बेरोज़गारों के बाज़ार में
बवाल काटने का हुनर
बढ़िया परखता है

बीरबल सिंह 'भाया'
ठिकाना बड़ा चौराया
साल भर कोरी कमसिन कलियाँ चुनता है
मगर चुनाव आते ही
जातियों का मकड़जाल
वही बुनता है
शकल हीरो की, अकल विलेन की रखता है
Market में बढ़िया बिकने वाली
जाति वही परखता है

ना किसी को मज़हब की दवा
ना ही चाहिए राजनीति की दारु
सबको चाहिए बिकने वाला माल
सब के सब ससुरे हैं बस बाज़ारू

Wednesday, March 26, 2014

चूतियों के जन्म को रोक सके बनी ऐसी कोई rubber नहीं
है खबर ज़माने भर की इन्हें, बस अपनी कोई खबर नहीं

Expert बनने की फुंसी जाने कब किसको क्यों फूट पड़े
Google पे हर सच ज़िन्दा है, पर झूठ की कोई कबर नहीं

अब देशप्रेम दिखलाना है by hook, by crook, or by facebook
जो आज तलक कुछ भी ना किये, उन्हें कल तक का भी सबर नहीं

Thursday, February 13, 2014

समस्या

"क्या समस्या है?"

"साब वो फलाना प्रसाद
करता है दंगा-फसाद
सरकारी ज़मीन
खसरा नं. दो सौ तीन
पर बांधता है मवेशी
करवाइए उसकी फ़ौरन पेशी
ये सभी अतिक्रमियों के लिए सबक होगा
वरना बाधित सरकार का हक़ होगा
आपकी सारी नक्शेबाज़ी बेकार होगी
ये सरकार के साथ-साथ हम सबकी हार होगी"

"अच्छा, पर तुम्हारी क्या समस्या है?"

"साब अभी तो बताया"

"हाँ पर मुझे समझ नहीं आया
ज़मीन तो है सरकार की
फिर तुम क्यूँ बातें करते हो जीत-हार की?"

"कमाल करते हो साब
कहाँ गया आपका सरकारी रुबाब?
वो अतिक्रमी दुष्ट है, दुराचारी है
और ज़मीन सरकार की सही
लेकिन सरकार तो हमारी है!"

"बोला तो काफी बढ़िया है
लेकिन मैं अब भी नहीं समझा तुम्हारी समस्या क्या है?"

"समस्या?
मेरी समस्या है आपका पटवारी
और उसके जैसे सभी नालायक नाकारा कर्मचारी
जो तनख्वाह लेते हैं सरकार की
और राह लेते हैं भ्रष्टाचार की
मेरी समस्या है आप जैसे अफसर
जो कभी छोड़ते नहीं हैं दफ्तर
इस आरामकुर्सी पर बैठे
बिना किसी बात के ऐंठे
समाज सेवा का करते हैं नाटक
पर आम आदमी के लिए बंद हैं आपके फाटक
ज़मीन से दूर हवा में किले बनाते हैं
ख्याली पुलाव पका कर जनता को खिलाते हैं
मेरी समस्या है ये सड़ा हुआ सिस्टम
जिसमें चिंदी चोर चमगादड़ ज्यादा हैं
इंसान बहुत कम
हमारे फायदे के लिए बनाया गया
हमारा ही फायदा उठाता है
65 सालों से हमको चूतिया बनाता है
यहाँ अपना ही हक़ मांगने के लिए
करनी पड़ती है सालों तक तपस्या
यही है बड़े साब मेरी सबसे बड़ी समस्या!"

"तुमने मेरी आँखें खोल दीं
जो हर आम आदमी के दिल में उबल रही है
वो बात बोल दी
अब कोई कुछ भी कहे
नौकरी रहे ना रहे
मैं साथ हूँ तुम्हारे इस संघर्ष में
हमारी भी जीत होगी इस आम आदमी के वर्ष में
सही में सड़ चुका है ये सिस्टम सरकारी
मगर मेरे भाई, अब तो बता दो
वाकई में समस्या क्या है तुम्हारी?"

"अरे साब, आप अब तक नहीं समझे?
इतना ज्ञान मैं दोबारा ना दूंगा
जब वो अपने मवेशी खोलेगा
तभी तो मैं अपने बांधूंगा"

Thursday, December 12, 2013

शिकायतें

आजकल शिकायतें बहुत हैं

दुनिया से और दुनियावालों से
क़ानून से और उसके रखवालों से
पैसे की पूजा करने वालों से
पूजा में पैसे धरने वालों से

सड़क पर बढती जा रही cars से
खुद की car ना होने के विचार से
देश में फैले भ्रष्टाचार से
अपनी भ्रष्ट हरकतों के प्रचार से

Back to back चुनाव से
तंत्र में लोक के अभाव से
जातियों के बीच खिंचाव से
अपनी जाति के बचाव से

'Gay' सुनते ही नाक-भौं सिकोड़ने से
हर ठीकरा court के सर फोड़ने से
सरकार के वादे तोड़ने से
सब सरकार भरोसे छोड़ने से

खबरों के avalanche से
अरनब के पिछवाड़े की आंच से
पड़ोसी की खिड़की के काले कांच से
अपनी privacy पर ज़रा-सी आंच से

अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक मंदी से
खाली बैठने पर पाबंदी से
अपराधियों की अक्लमंदी से
ज़बरदस्ती की तुकबंदी से

अपनी हर गलती छुपाने को हुकूमत-ए-विलायत है
इसीलिए इस मुल्क को अपने आप से शिकायत है

Wednesday, July 10, 2013

एक था राजा

कोई कहता था उसे शूरवीर
कोई कहता लम्पट
आधी दुनिया को रौंद के वो
पहुंचा सिन्धु के तट

रणभूमि था मंदिर उसका
वो जंग का था फ़रियादी
रण में ही मनन किया उसने
रण में ही ढूंढी समाधि

राजा नहीं, वो था सेनानी
गद्दी से कोसों दूर
ना सुख की, ना सत्ता की भूख
सन्यासी, किन्तु क्रूर

सिन्धु के तट पर तब उसने
देखा एक अजब अजूबा
तन पानी में, और मन तो खुद
मन के दरिया में डूबा

पूछा राजा, "हे सिन्धुवासी
क्या है तेरा नाम?
यूं भरी दुपहरी स्नान करे
क्या नहीं तुझे कोई काम?"

वो मुस्काया, बोला "राजन
मैं हूँ बिलकुल बेकार
तू आया पार कर सौ दरिये
मैं गया ना सिन्धु पार"

हैरान हो गया वीर पुरुष
"कैसे तू पाया जान?
कि दूर देस से मैं आया
जिसे कहते हैं यूनान"

पागल-सा हंसा अचानक वो
"नहीं ये कोई चमत्कार
थक गया है तू चलते-चलते
अब लगता है बीमार"

"बकवास!" कह गरज उठा योद्धा
"मैं थकता नहीं कभी
तेरी धरती को जीत
बना लूँगा तुझे दास अभी"

"मैं हूँ इस धरती का लेकिन
मेरी कोई धरती नहीं
जो जीतना है तू जीत के आ
मैं मिलूँगा तुझे यहीं"

योद्धा बोला, "पहले ये बूझ
कैसे है तू बेकार?
अपने जीवन से तुझे नहीं
क्या तनिक भी सरोकार?

ये यौवन तो है क्षणभंगुर
पल में कट जावेगा
गर कुछ ना किया तो मरते दम
तू बहुत पछ्तावेगा

मेरे भी देश में हैं ज्ञानी
बतलाते मृत्यु-रहस्य
कहते कि स्वर्ग पहुँचने को
दो सिक्के लगते बस

मैं तो अब इतना जीत चुका
कि स्वर्ग भी लूँगा खरीद
और तेरे हाथ बस आएगी
मेरे घोड़े की लीद"

ये सुन के और हंसा साधू
"बातें तेरी बालक-सी
ना सृष्टि की है समझ तुझे
ना सृष्टि के चालक की

तू मौत भी सिक्कों में तोले
स्वर्ग जाएगा रिश्वत दे के
अरे मौत प्रेयसी है वेश्या नहीं
जो जेब के भार को देखे

पीर मरे, पैगम्बर मरे हैं
मर गए जिन्दा जोगी
राजा मरे, प्रजा मरी है
मर गए वैद और रोगी

पर मौत भी कोई अंत नहीं
सब लौट के फिर आयेंगे
इस जन्म में जो भी कर्म किये
उनका ऋण चुकायेंगे

जब लौट के यहीं पे आना है
तो फिर जल्दी काहे की?
तुझ से तो कहीं बेहतर है
ज़िन्दगी एक जुलाहे की

तू सिन्धु पार तो कर लेगा
पर दूर ना जा पायेगा
तेरा काल तुझे जल्दी ही
वापस खींच लाएगा

तूने युद्ध में जितने भी मारे
सब वीरगति को पाए
तेरी मौत होगी इतनी मामूली
कि बताने में शर्म आये"

इससे ज़्यादा सुन सका नहीं
आगबबूला हो गया वीर
झटके में शीश ने छोड़ दिया
साधू का तड़पता शरीर

सिन्धु तो पार कर गया वो
पर सेना हो गयी पस्त
और मगध का वर्णन सुनते ही
लग गए सभी को दस्त

फिर झेलम से ही लौट चला
शूरवीरों का वो दस्ता
और मरा वहीँ जाकर राजा
जिस जगह से था वाबस्ता

पर दोनों लौट के फिर आये
किस्मत का अजब है झोल
राजा अब के बन गया फ़कीर
साधू बन गया मंगोल

कौन है राजा? कौन फ़कीर?
कभी सिकंदर, कभी कबीर

कौन प्रसिद्ध है? कौन अनजान?
कभी साधू, कभी चंगेज़ खान

Sunday, February 17, 2013

सुना है...

सुना है कोई कुछ बोला है
किसी ने आहत भावनाओं को लफ़्ज़ों में तोला है
क्या बोला है ये तो पता नहीं
पर इसमें हमारी खता नहीं
कहने-सुनने का जाता रहा वक़्त
जंग वही है, हथियार नए हैं फ़क़्त
हज़ारों साल पुराने ज़ख्मों को
किसी ने फिर से टटोला है
सुना है

सुना है कुछ नीची जातें
करने लगी हैं ऊंची करामातें
लानत है! शर्म है! धिक्कार है!
लूट-खसोट तो ऊंची जातों का जन्मसिद्ध अधिकार है
खैर ये विवाद भी बढ़िया है
कि किसने देश को कितना लूट लिया है
कौन बन चुका है पुराना नासूर
और कौन नया-नया फफोला है
सुना है

सुना है कोई नौटंकी वाला
film बनाने चला था साला
ज़रूर उसके दिल में शैतान है
क्यूंकि film की setting अफ़ग़ानिस्तान है!
देखें तो पता चले शायद
क्या है इस काफिर की कवायद
मगर देखें तो देखें कैसे?
हम ही ने तो release के खिलाफ मोर्चा खोला है
सुना है


Monday, October 29, 2012

आलस के बीज

कलियुग की गीता के रचयिता श्रीलाल शुक्ल ने कहा है कि हिन्दुस्तानी आदमी मूलतः कवि होता है। वह किसी समस्या को देख कर पहले उस पर कविता करता है, फिर उसके समाधान के बारे में सोचता है।
हो न हो, ये बात उन्होनें U.P. वालों के लिए ही कही होगी।

इसी बात पे अर्ज़ है,

पश्चिम में उगा हरियाली का सूरज
पूरब की बाढ़ में अस्त है
अवध दंगों मे busy है
सूखा बुंदेलखंड पस्त है

इस state का कविता के सिवा कोई culture नहीं है...कम से कम कोई एक कल्चर तो नहीं। पड़ोसी states से culture चुरा-चुरा के उसमें आलस का बीज बो देते हैं। जैसे मेरठ के लोग आलसी हरियाणवी हैं, नोएडा के आलसी दिल्लीवाले, इलाहाबाद के आलसी बिहारी, झांसी के आलसी भोपाली वगैरह वगैरह। हाँ, अवध वाले original आलसी हैं।

इन सब जगहों का अगर है कोई common culture, तो वो हैः चाय और बकर।

Higgs-Boson से लेकर सुसरी माया का मायाजाल
और अमरीका की गलतियों से लेकर भैयाजी के तालाब में दबे कंकाल

अपनी समस्याओं को भूलकर दुनिया की हर समस्या पर अपनी राय देना यहाँ pastime भी है और timepass भी। यहाँ लोग General Studies पढ़ते नहीं, जीते है। बेरोज़गार और सरकारी अफसर इस खेल के सबसे मंझे हुए खिलाड़ी हैं।

(6 लोग चाय की दुकान पर बैठे हैं)

1: "अबे एक बात बताओ, ये भगवान लोग करते क्या थे?"

2: "क्या मतलब?"

1: "अबे मतलब भगवानबाजी के अलावा क्या करते थे? जैसे ब्रह्मा जी क्या पूरे दिन कमल पर टिकाए रहते थे?"

3: "भैया इस्लाम में ऐसा कोई चक्कर नहीं। अल्लाह एक,रसूल एक, याद करने को कहानी भी एक।"

1: "अबे हमें कौन कहानी याद करा सकता है? बचपन से माँ-बाप रामायण तो करवा ना पाये।"

2:"लेकिन तुम तो कारसेवक थे बे??"

1: "अबे जैसे-तैसे गुंबद पे चढ़ तो गए थे लेकिन आज तक ये समझ नहीं आया कि चढ़े काहे?"

4: "अबे तिवारी तुम कुछ बोलते काहे नहीं हो?"

5: "का बोलें बे?"

6: "बंद करो ये झांय-झांय
रघुकुल रीति सदा चली आई
दंगों में प्राण जायें
पर राम मंदिर का वचन ना जाई

हम समझाते हैं बे रामायण तुम्हें,

लंका के राजा रहे एक रावण भाईजान
शिव को चूना लगा ले लिहीस अमरत्व का वरदान

अमरत्व का वरदान पड़ा देवों को भारी
इंद्र की तो गीली हो गईं लंगोटें सारी

आर्डर कर दिया ससुरा कि सब शीश झुकेंगे
कौनो रंगबाजी करे तो उसकी कह के लेंगे"

2: "इसी बीच अयोध्या में चले रहा अलग ही ड्रामा
बाप की करतूतों के चलते वन पहुंचे श्रीरामा

खिला रहे थे सिया-राम वनवास के बीच ही गुल
लखन को मगर बकैती करने की थी तगड़ी चुल

थी तगड़ी चुल कि जम जावे अपनी धाक
बेफालतू काट दीन सूपर्नखा की नाक"

6: "रावन को जब मिली खबर हो गए फौरन चुर्रैट
आनन-फानन में यूं ही सीता को लिए लपेट"

2: "लिए लपेट और समझे खुद को बड़ा धुरंधर
इतने में श्रीराम पा गए एक धांसू बंदर..."

1(चिढ़ते हुए): "बंद करो बे फिर चालू कर दिए पोथी बांचना।"

4: "अबे तिवारी तुम कुछ बोलते काहे नहीं हो?"

5: "काहे बोलें बे?"

3: "वैसे भी अब जमाना God का नहीं God Particle का है। इसी बात पे अर्ज़ है...तवज्जो चाहूंगा"

सभी: "हाँ हाँ दिया दिया"

3: "अजब सी है ये दास्तान-ए-ज़िन्दगी
Particle खुदा है, और इन्सान कुछ भी नहीं?"

सभी: "वाह वाह बहुत अच्छे!"

1: "वाह वाह उतार जूता मार टमाटर सड़ा अंडा!"

6: "अबे रहने दो, माना Higgs-Boson का अंदाज़ बाकियों से जुदा है
पर ससुरा जब तक पकड़ ना आए तभी तक खुदा है"

1: "ये सब छोड़ो, असली खबर ये है कि चुनाव आने वाला है।"

3: "चुनाव पे अर्ज़ है...तवज्जो चाहूंगा"

सभी: "फिर से?? अभी तो दिए थे"

6: "अच्छा सुनाओ"

3: "चुनाव तो वोटों का बाज़ार-सा है
और बेवड़ों का त्योहार-सा है"

सभी: "वाह वाह!"

4: "भैया दारू बेकार है, जाति बरकरार है
जाति माया है
जाति ने ही CM बनाया है
ये social engineering है
Politics की bearing है

जाति में समाजवाद भी है
और U.P. इसी में बर्बाद भी है

1: "जाति में कल्याण है"

3: "जाति में उमा है"

6: "जाति कठोर है"

2: "जाति मुलायम भी है"

4: "इसीलिए तो सबके दिलों में कायम भी है!"

सभी: "अंग्रेज़ी है कि आती नहीं, और जाति है कि जाती नहीं"

2 (अखबार पढ़ते हुए): "लो और सुनो, सरकार अब मुफ्त अनाज देगी"

3: "इसी पर अर्ज़ है..."

सभी: "अबे फिर से?? ये आखिरी बार दे रहे हैं"

3: "तो सुनो,
चौके में आतंक पंसारी का
और चौकी में अंसारी का"

सभी: "भई वाह क्या बात है"

4: "अबे तिवारी तुम कुछ बोलते काहे नहीं हो?"

5: "काहे बोलें बे?"

6: "अंसारी...अच्छा मतलब मऊ से हो?"

3: "बिलकुल, और तुम कहां से हो गुरू?"

6: "हम तो वहीं से हैं जहां तीन देवता वास करते हैं: हनुमान, High Court और आलस"

2: "मतलब इलाहाबादी हो?"

6: "सही पहचाने,
वकीलों से घिरे पड़े
जहां जज भरे गिरे-पड़े
दो ठो petition हमसे भी धोखे में ही लगवा दी हैं
क्योंकि हम इलाहाबादी हैं

गंगा का पानी पीते हैं
जमुना में लेकिन जीते हैं
हनुमान को भी हमनें लत आराम की पड़वा दी है
क्योंकि हम...

पुरबिया बयार भारी है
फितरत से तो बिहारी हैं
तबियत से अलबत्ता हम लखनऊ-कानपुर इत्यादि हैं
क्योंकि हम..."

5 (तिवारी): "हटाओ बे इलाहाबाद, असली रस तो बस बनारस में है!"

सभी: "सही कहा गुरू!"

और इतने विचार-विमर्श के बाद सारी समस्याओं का निकला ये समाधान: खाओ भांग, चबाओ पान

(खईके पान बनारस वाला)

Saturday, July 21, 2012

ललकार

जो चाहा मुझको मिला नहीं 
है खुद से खुद को गिला कहीं
क्या मेहनत का है सिला यही?
है खुद से खुद को गिला कहीं


एक-एक कंकर कर के 
था रस्ता साफ़ किया मैंने 
छोटी-सी गलती पर भी ना
था खुद को माफ़ किया मैंने


सब आशाओं को जोड़ के फिर 
था पर्वत-सा एक लक्ष्य बना
कई लोग थे टीले से ही खुश 
पर मैंने ऊंचा ध्येय चुना 


पर्वत मुझसे वो हिला नहीं 
है खुद से खुद को गिला कहीं 


था ध्यान धरा हर धागे पे
और बुना था एक रेशमी ख्वाब 
तारे तो सब हैं बन जाते 
मुझको बनना था आफताब 


सोचा था होगा एक रोज़ 
तारों पे बड़ा रुबाब मेरा 
क्या कमी रह गयी बुनने में 
कच्चा-सा रह गया ख्वाब मेरा 


ये रेशम मुझसे सिला नहीं
है खुद से खुद को गिला कहीं


एक घास के ढेर-सी है दुनिया
और हम सब केवल तिनके हैं
पर गुल बन पाने के अरमां
दिल के कोने में जिनके हैं


वो मुझ जैसे कुछ पागल हैं
दुनिया की भीड़ से रहते दूर
नहीं मानते सच की सच्चाई
भले सपने हो जायें चूर-चूर


पर वो गुल क्या जो खिला नहीं
है खुद से खुद को गिला कहीं


खैर वो मंज़िल भी क्या मंज़िल 
आसान हो जिसको पा लेना 
जिससे जीने में जान आये 
उस दर्द की भी क्या दवा लेना 


अँधेरे से याराना है 
गर रात घनेरी ढले तो क्या 
मंज़िल तो पानी है मुझको 
कोई साथ अगर ना चले तो क्या 


मुसाफिर हूँ काफिला नहीं 
अब खुद से मुझको गिला नहीं 


बस हार के डर से डर के मैं
मैदान कभी ना छोडूंगा
भगवान अगर तू है तो सुन 
मैं किस्मत का मुंह मोडूँगा 


हाथों की रेखा घिस-घिस के 
तेरे लिखे को बदलूँगा एक दिन
और सिखाऊंगा हर इंसां को
जीना तेरे संबल के बिन


तू किसी को अब तक मिला नहीं
तुने घाव किसी का सिला नहीं
अब थमेगा ये सिलसिला नहीं
अब खुद से मुझको गिला नहीं

Tuesday, July 17, 2012

क़लमाँ

क्या कहूँ कहाँ से शुरू करूँ
मैं खुद ही तुझसे हुआ शुरू 

इतनी सी कहनी थी बस बात
सर पे रखे रहना तू हाथ

कुछ ठीक-ठीक अब याद नहीं
पर जब मैं रोता था 
मेरी हर आह का असर कहीं 
तुझपे भी होता था 

एक नीम की टहनी हाथ में ले
तू रातों जगती थी
जब chickenpox की तीखी खुजली
मुझको लगती थी

क्या पता कि कैसे मैंने ये 
पढ़ना-लिखना सीखा 
जब टीचर ने पीटा मुझको
तेरा दिल क्यूँ चीखा?

मैं भूत से कितना डरता था 
क्या है कुछ याद तुझे?
उस महावीर से ज्यादा तेरा
था आसरा मुझे 

अब सोच-सोच के हँसता हूँ 
क्या वो भी मैं ही था?
जिसकी दुनिया में जो भी था 
वो बस तुझसे ही था

कभी बिना बात बैठे-बैठे 
दिया प्यार भरा बोसा 
कभी चांटा जड़ अपने ही हाथ को
जी भर के कोसा 

"कुछ पढ़ो, जहां में नाम करो"
तू ही तो कहती थी 
फिर दूर मुझे खुद से करके 
क्यूँ रोती रहती थी?


हंस के कहता होगा तेरी 
किस्मत लिखनेवाला 
"इसको तो बच्चों के आगे 
कुछ ना दिखनेवाला"

इस खेले में कभी जीत मिली 
और कभी मिली मुझे हार 
पर जीत-हार से परे है माँ
तू और तेरा ये प्यार 

मैं चार लफ्ज़ से क्या तेरा
ये क़र्ज़ चुकाऊंगा 
गर कोशिश की तो लिखते-लिखते
ही मर जाऊंगा 

बस बहुत लगा लिया मस्का 
बिन बात के ही तुझको 
चल हलवा खीर समोसे का
अब भोग लगा मुझको